अथ कोसल देश मीडिया आख्यानम

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अथ कोसल देश मीडिया आख्यानम

अजयभान सिंह 

शिवगंगा नदी के सुरम्य तट पर सुंदर पर्ण कुटीरों के बीच बनी विशाल यज्ञशाला में बैठे बटुकों, ब्रह्मचारियों को करुणा से देखते हुए परमाचार्य स्वामी अड़बड़ानन्द ने दक्षिण कोसल राज्य की कथा सुनाते हुए कहा, "वर्ष 2023 के चुनावी रण में राजा व्याघ्रदेव का कराग्रदल अपने शौर्य को बरकरार नहीं रख सका और एकजुट कमलदल के हाथों बुरी तरह खेत रहा। सत्ता महाठगिनी माया की तरह उसके हाथ से फिसलकर सहिष्णु देव की चेरी हो गई। कमलदल के पुराने राजा रम्यकमन नए राजा का मार्गदर्शन करने लगे। 

कैसा विचित्र विरोधाभास है कि कमलदल में हर्ष व्याप्त था तब भी सभी योद्धा नए राजा के चयन से खुश नहीं थे। उधर, कराग्रदल तो वैधव्य जैसे संताप में था लेकिन फिर भी उसके कुछ क्षत्रप मन ही मन मुस्करा रहे थे। व्याघ्रदेव के मनमाने और निरंकुश शासन से उनके ही दल के कई शक्तिशाली सामंत उनके विरुद्ध खड़े हो गए थे। 

रनिवासों में जो हर्ष-विषाद व्याप रहा था, वह तो फिर भी अकारण नहीं था। किन्तु एक और वर्ग था जहां राजप्रासादों से ज्यादा विधवा विलाप हो रहा था। यह नारदी-वृत्ति करने वाले संचार कर्मियों का विचित्र संसार था। यह संवादकर्मी नित्य ही अपनी रुचि और स्वार्थ के आधार पर या तो राजा और दरबार की स्तुति करते या फिर उसकी निंदा करते। 

स्तुति करने वाले पत्रकर्मियों पर महल, कोठी, रथ, स्वर्ण और सम्मान के रूप में व्याघ्रदेव की कृपा बरसती थी। कदाचित इसलिए व्याघ्रदेव की पराजय से कई पत्र कर्मियों को तो जैसे काठ ही मार गया। वे अत्यंत विषाद में पहुंच गए और कई दिनों तक लगातार रुदन करते रहे। यहां तक कि भोजन और श्रृंगार करना तक भूल गए। 

यूं कृपा बरसती तो राजा रम्यकमन के राज में भी बहुत थी, किन्तु 2018 के रण में उनकी पराजय के बाद अपने वैधव्य का ऐसा मुजाहिरा करने वाला कोई पत्रकर्मी नहीं दिखा था। उल्टे उनका सबसे प्रिय, सहोदर जैसा सखा और अत्यंत विश्वास पात्र पत्रकर्मी हिरण्यांश वेदपाठी तो उनकी पराजय का संकेत पाकर ही शत्रु शिविर में जा मिला था। 

खैर, समय का चक्र चला और एक दिन महाठगिनी सत्ता व्याघ्रदेव के पाश से भी निकल भागी। उसके अत्यंत विश्वासपात्र संवाद कर्मी अतिरेक युगल ने सार्वजनिक रूप से अपने आपको संयत रखा लेकिन घर जाकर पूरे तीन पहर तक विलाप किया। फिर रुदन से सूजी आंखों और मलिन कपोलों पर भरपूर श्रृंगार करके उसने अपनी छाती पर पत्थर रखा और अपने अंतरंग मित्र ऋषिकेश सुप्त के संग चल पड़ा कमलदल में नए राजा का अभिनंदन करने। 

नए राजा के अंतरंग मंडल में जबरन जा घुसे उसके एक अन्य सखा अनित्य वाणी ने दोनों का आत्मीय स्वागत किया और राजा से भेंट कराई। अनित्य को खूब पता था कि उसका मित्र नए राजा के आगमन से अत्यंत आहत था, किन्तु प्रपंच रचने का हुनर देखिए कि उसके मुखमंडल पर संताप का लेश मात्र भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था।   

अनित्य ने उसका परिचय कराते हुए राजा से कहा "प्रभु यह हमारे कमलदल के परम भक्त, मित्र और सहयोगी हैं। व्याघ्रदेव के पांच साल के राज में इन्होंने सपरिवार अपार कष्ट और वेदना सही है। प्रभु मेरी प्रार्थना है कि इन्हें सुख और अभय का आशीर्वाद दिया जाए"। कोमल हृदय वाले राजा सहिष्णु अतिरेक की करुण-कथा सुनकर अत्यंत द्रवित हो उठे और उनकी आँखें सजल हो गईं। 

अभिनय में नटराज को भी पानी पिलाने में समर्थ अतिरेक ने लोहा गर्म जानकर अपना अंतिम अस्त्र छोड़ते हुए कहा, "हे कमलदल भूषण, छत्तीसगढ़ कुलावतंश, करुणा और क्षमा के सिंधु, महाराज सहिष्णु देव। आप जैसे देव पुरुष और प्रजा वत्सल राजा को पाकर आज कोसल देश पहली बार धन्य हुआ है। राजन, पूर्ववर्ती राजा के राज में मैंने ऐसा भीषण दमन झेला है कि इस जन्म में उसको भुला पाना असंभव जान पड़ता है। प्रभो, कैसे बताऊं कि आपके राजपाट को देख पाने के लिए ही ये प्राण किसी तरह अटके हुए थे। कहते हैं दीनों के भगवान होते हैं, आज भगवान ने कोसल देश के हम दीनों की सुन ली। आप हमारे लिए दीनबंधु बनकर आए हैं", इतना कहते हुए अतिरेक युगल ने मंद-मंद मुस्कराते हुए अनित्य और ऋषिकेश को कुटिल दृष्टि से देखा। 

ऋषिकेश अपने लंगोटिया मित्र की धूर्तता और अभिनय का मुरीद था, लेकिन आज तो वह भरतमुनि के नाट्यशास्त्र की सारी कलाओं का एक साथ दर्शन पाकर हतप्रभ था। नए राजा भोले थे, यह देखकर प्रसन्न हुए लेकिन बोले कुछ नहीं। लेकिन राजा के सबसे प्रमुख दरबारी सरसिज नाथ तो पत्रकर्मी के उजबक प्रदर्शन से लट्टू ही हो गए। इसके बाद अतिरेक युगल नए राज के प्रिय और विशिष्ट कृपापात्रों में गिना जाने लगा। उसके तेल फ़ुलेल का कोटा दोगुना कर दिया गया। अगले साल राज्य की ओर से उसका अभिनंदन भी किया गया। 

उदार राजा रम्यकमन के राजकाल में कुलगुरु जैसा राज सम्मान प्राप्त हिरण्यांश वेदपाठी को तो इतना प्रहसन भी नहीं करना पड़ा। कमलदल के प्रचार विभाग में उनके चरण-चारणों की कमी न थी। इन सेवकों ने बड़े आव आदर के साथ वेदपाठी को नए राजा के दर्शन कराए। वेदपाठी ने पलक झपकते ही अपनी मोहिनी के पाश में राजा को बांध लिया और उसके साथ ही कमलदल राज में वेदपाठी की विभूति फिर कायम हो गई। 

व्याघ्रदेव के लिए किसी की जान लेने और अपनी जान देने वाले इन्द्रध्यान त्रिवेदकर्मी को कराग्रदल की पराजय से ऐसा आघात पहुंचा कि कई दिनों तक सुध बुध खो बैठा। फिर कमलदल के प्रचार विभाग में अपने सुह्रद मित्रों के सहयोग और समर्थन से उसने भी नए राजा से मैत्री गांठ ली। नारदी वृत्ति से जीवन यापन करने वालों से संपर्क एवं संबंध बनाए रखने के लिए गठित प्रचार विभाग के सबसे उच्च पद पर त्रिवेदकर्मी का एक बड़ा भक्त आसीन था। सो उसकी सेवा सहायता तो मिलनी ही थी। 

उधर, विघ्न संतोषियों का एक वर्ग और था, जिनके बारे में आशंका थी कि उन्होंने युद्ध में कमलदल की सहायता की। लेकिन इस दावे का किसी के पास कोई प्रमाण नहीं था। कमलदल के प्रचार विभाग ने झूठे दावे कर राज्याश्रय प्राप्त करने, तेल फुलेल और सम्मान पाने तथा राजा को दिग्भ्रमित करने का आरोप लगाते हुए ऐसे सभी लोगों को कमलदल और राजदरबार में तांक-झांक करने से प्रतिबंधित कर दिया। 

इसके बाद कोसलदेश में आनंद की वर्षा होने लगी। सभी विघ्नसंतोषियों, उपद्रवियों और अप्रामाणिक दावे करने वाले लोगों का अरण्य रोदन चलता रहा लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। इतना कह कर स्वामी अड़बड़ानंद ने एक दीर्घ स्वास ली, उनका मुख विवर्ण हो गया, संताप की लकीरें प्रशस्त ललाट पर उभर उठी और वह धीरे धीरे विराट मौन में समाते चले गए। 

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