अजयभान सिंह
रायपुर, 01 सितम्बर।
एक ऐसे दौर में जब राहुल गाँधी और उनकी कांग्रेस वोट चोरी की माला जप रही है, दिल्ली दरबार से बहुत दूर छत्तीसगढ़ के शांत जंगलों से पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को लम्बे समय तक सत्ता में बनाये रखने की एक नयी कहानी सामने आ रही है। आप इसे एक ‘सियासी-थ्रिलर’ कह सकते हैं। जिन्हें इस तरह की जानकारी कम होती है, या जो लोग सिस्टम को होली काऊ समझते हैं, वह लोग इसे ‘मेगा-कॉन्सपिरेसी-थ्योरी’ भी कह सकते हैं। जानकार बताते हैं कि कम से कम दो तीन विधानसभा उपचुनावों में इसे चुनावी रस्साकशी की कसौटी पर कसा गया और सफल होने पर नाम दिया गया ‘खैरागढ़-टेम्पलेट’ या ‘खैरागढ़-मॉडल’।
बेशक, तब के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी कांग्रेस पार्टी को इसका सीधा फायदा होने वाला था, लेकिन इस मॉडल की योजना, रचना और क्रियान्वयन कथित रूप से राज्य के खुफिया महकमे के विशेष दस्ते ने अंजाम दिया। हालांकि पूरी योजना सिरे चढ़ पाती इसके पहले ही ईडी और आईटी की धमक से इस पूरे रचना-संसार का कमांड-कंट्रोल ध्वस्त हो गया। इस समाचार-कथा में हम विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे कि किस तरह यह योजना बनी और किस तरह इसको अमल में लाया गया।
कहां और कब शुरू हुआ किस्सा
इस कहानी का श्रीगणेश मरवाही उपचुनाव से होता है जहां सत्ताधारी दल ने जोगी के किले को ध्वस्त करने के लिए सरकारी और सियासी तंत्र के घालमेल से एक खास किस्म का चुनावी फार्मूला तैयार किया। हालांकि, अभी यह सियासी पुड़िया मुकम्मल नहीं थी। इसमें कुछ नए मसालों की दरकार थी। कुछ समय बाद खैरागढ़ का उपचुनाव सामने आ गया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी अधिकारियों ने मरवाही के चुनावी-चूर्ण में कुछ दिमाग हिला देने वाले प्रयोग शामिल किए और उन्हें सफलता पूर्वक अंजाम दिया। नतीजतन, कांग्रेस प्रत्याशी श्रीमती यशोदा वर्मा ने भाजपा के उम्मीदवार को करीब 20 हजार मतों से हरा दिया।
अब आते हैं कहानी के उस हिस्से में जहां इस 'खैरागढ़-टेम्पलेट' की रचना की गई। कहानी का यह हिस्सा शुरू होता है तब, जब ढाई-ढाई-साल मुख्यमंत्री पद पर रहने की लड़ाई में टी एस सिंहदेव भूपेश बघेल से पार नहीं पा सके। इसके बाद भूपेश के विश्वासपात्र अधिकारियों की टीम ने तय किया कि दाऊ को अगले बीस साल तक मुख्यमंत्री बनाकर रखना है। इस योजना पर एक फूलप्रूफ-पॉलिटिकल-फ्रेमवर्क बनाने का जिम्मा कथित रूप से पुलिस विभाग के कुख्यात/विख्यात क्वाड-A को दिया गया। देशी संदर्भों में क्वाड A का अर्थ हुआ A नामधारी लोगों की चौकड़ी।
यह क्वाड A है क्या बला?
जानकार बताते हैं कि इस समूह में तब के डीजीपी अशोक जुनेजा, खुफिया महकमें के IG आनंद छाबड़ा, रायपुर के एसएसपी आरिफ शेख और एडिश्नल एसपी अभिषेक माहेश्वरी हुआ करते थे और यही समूह तबसे लेकर आज तक पूरे पुलिस विभाग का असली माई-बाप है। जुनेजा के रिटायरमेंट के बाद अमरेश मिश्रा अब क्वाड-A के नवागत और उभरते हुए सितारे हैं। मुख्यमंत्री के सबसे प्रिय अधिकारी राहुल भगत के घनिष्ठ मित्र आरिफ शेख इस समूह के थिंकटैंक, फ़िलोसोलॉफर, रणनीतिकार या नियंत्रक कहे जाते हैं। जबकि एडिश्नल एसपी अभिषेक माहेश्वरी जिन्हें उनके गृहनगर डोंगरगांव में प्यार से मोनू कहा जाता है, इस पूरे समूह के 'सीईओ' कहे जा सकते हैं।

अभिषेक यानी कि मोनू ही वह कड़ी थे जो मुख्यमंत्री बघेल की परमशक्तिशाली उपसचिव सौम्या चौरसिया और पुलिस के आला हुक्काम के बीच संवाद कायम रखते थे। आप उन्हें Her Majesty का Man-Friday भी कह सकते हैं। जानकार बताते हैं कि क्वाड-A की तरफ से माहेश्वरी इस सीक्रेट ऑपरेशन के लिए कांग्रेस वॉर-रूम और टेम्पलेट के ज़मीनी दस्तों के बीच समन्वय कर रहे थे। वैसे इसमें भी कुछ नया नहीं है कि कुछ पुलिस सत्ताधारी दल को ग्राउंड इंटेलिजेंस प्रदान करे। लेकिन ये टेम्पलेट, सिस्टम का सत्ताधारी दल के प्रति महज स्वाभाविक झुकाव नहीं था। बल्कि यह सरकारी तंत्र की एक दल की सत्ता कायम रखने की बड़ी साजिश थी।
आज भी दर्जनों लोग इस बात की तस्दीक कर सकते हैं कि किस प्रकार माहेश्वरी अपने विश्वस्त लोगों के सामने कई बार यह दावा करते थे भी कि दाऊ को अगले बीस साल तक मुख्यमंत्री बनाकर रखेंगे। कहा जाता है कि रिसोर्स मोबाइलाइजेशन यानी संसाधनों को जुटाने और लक्षित स्थानों तक पहुंचाने में माहेश्वरी लासानी हैं। आखिर क्यों न हो, CA जो ठहरे।
कारवां कैसे बढ़ा ?
अब इस रूमानी और कल्पित से लग रहे थ्रिलर को थोड़ा फ्लैश बैक में खैरागढ़ ले चलते हैं। पुलिस विभाग के किस्सागो बताते हैं कि खैरागढ़ उपचुनाव के लिए खुफिया विभाग के चुनिंदा अधिकारियों और कर्मचारियों को कुछ दिन तक बाकायदा एक 'ओरियंटेशन प्रोग्राम' के जरिए चुनावी राजनीति के कुछ मूलभूत पाठ पढ़ाए गए। फिर एक लंबी चौड़ी 'चेकलिस्ट' थमाकर एक-एक गांव में कांग्रेस की जीत को लेकर व्यापक सर्वे कराया गया। इस सर्वे में कांग्रेस के लिए सहायक और बाधक लोगों का पूरा डेटा एकत्र कर कांग्रेस के वार-रूम को भेजा गया। जहां तक उस समय के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो राजनीति में होने के कारण उन्हें अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए गैर-पारंपरिक नुस्खे आजमाने का पूरा हक है। लेकिन हम राजनीतिक दलों की नहीं, सरकारी सिस्टम की चर्चा कर रहे हैं।

उपचुनाव की घोषणा के बाद पूरे प्रदेश में कथित रूप से ऐसे सरकारी कर्मचारियों की खोज की गई जो खैरागढ़ क्षेत्र के रहने वाले हैं। उन्हें छुट्टी देकर कांग्रेस को जिताने के लिए उनके गांव भेजा गया। इस पूरे गोरखधंधे पर नजर रखने वाले एक सूत्र ने कहा कि शराब, पैसे और अन्य चीजों को प्रत्येक बूथ तक पहुंचाने के लिए पुलिस की गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया। बताया तो यहां तक जाता है कि क्वाड-A के एक अधिकारी तो पैसों की एक खेप स्वयं अपने वाहन में लेकर खैरागढ़ गए। कभी कवर्धा में डीएफओ रहे तब के वनमंत्री मोहम्मद अकबर के एक करीबी अफसर को खैरागढ़ भेजा गया।
डीएफओ साहब को वन रक्षा समितियों के सदस्यों के वोट दिलाने की जिम्मेदारी दी गई। हमारे सूत्र ने बताया कि इतनी महती जिम्मेदारी मिलने से गदगद डीएफओ ने समितियों के 20 हज़ार सदस्यों में से 13 हजार वोट सफलता पूर्वक कांग्रेस को दिलाए भी। इसी तरह मितानिनों और घर भेजे गए सरकारी कर्मचारियों ने भी काफी वोट कांग्रेस को दिलवाए। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि उन 13 हज़ार वोटों में से कांग्रेस के परंपरागत वोट नहीं थे। खैर, इस योजना की अपार सफलता के बाद कहानी का अगला और महत्वाकांक्षी चरण शुरू होता है। अब क्वाड-A को इस टेम्पलेट को एक मॉडल-फ्रेमवर्क के रूप में पूरे प्रदेश में लागू करने की जिम्मेदारी दी गई।
पूरे प्रदेश में लागू करने के लिया बना फ्रेमवर्क
इसके लिए सबसे पहले पूरे 90 विधानसभा क्षेत्रों में विशेष दस्तों का नेतृत्व करने के लिए सीक्रेट सर्विस ब्रांच (SSB) और लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) के अनुभवी और राजनैतिक रुझान वाले सब इंस्पेक्टर और हेड कांस्टेबल चुने गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (CAF) में उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश आदि राज्यों से ताल्लुक रखने वाले और राजनैतिक समझ वाले जवानों का चयन किया गया। इस तरह 2022 के मध्य तक सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों के लिए 700 से 800 लोगों की टीम का चयन हो गया।
प्रत्येक विधानसभा में जरूरत के हिसाब से 7, 8 या 9 लोगों की टीम तैनात की गई। लेकिन योजना की भनक किसी को न लगे इसके लिए इन सात -आठ सौ जवानों और अधिकारियों के ट्रांसफर आदेश का पृष्ठांकन नहीं किया गया ताकि उनका तबादला संबंधित जिले में रिकॉर्ड में न आने पाए। इन समूहों को भी एक व्यापक चेकलिस्ट यानी करणीय कार्यों की सूची सौंपी गई।

जानकार कहते हैं कि इस कार्य में खर्च होने वाला काफी पैसा कथित रूप से सीक्रेट सर्विस फंड से आया। महादेव ऐप के वसूली और शराब सिंडिकेट के नेटवर्क से भी काफी पैसा इसमें खर्च किया गया। वैसे यह लगभग एक खुला रहस्य है कि सभी चुनावों में धन और संसाधनों का जुगाड इसी तरह से किया जाता है। साधनों की कोई कमी न थी इसलिए सभी विधानसभा क्षेत्रों में टीमों ने तेज गति से काम करना शुरु कर दिया। इन दस्तों को आश्वस्त किया गया था कि वो खर्च की परवाह न करें। इन सभी टीमों का डेटा आनंद छाबड़ा और अभिषेक माहेश्वरी के पास आता और वहां से वह विश्लेषण के के लिए कांग्रेस के वार-रूम की डेटा-एनालिसिस-इकाई को जाता।
कांग्रेस की यह इकाई मुख्यमंत्री बघेल के निकटतम सहयोगी और संबंधी विनोद वर्मा की देखरेख में चल रही थी। एक राजनीतिक कार्यकर्ता होने के नाते विनोद वर्मा को पूरा अख्तियार है कि वह अपने दल की सत्ता को बनाए रखने के लिए यथेष्ठ प्रयास करते और वो ऐसा कर भी रहे थे। तब लाज़िमन ये सवाल मौजूं हो जाता है कि आखिर क्वाड -A सियासत क्यों कर रहा था।
हिटलर की खुफिया विंग एसडी
यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे हिटलर ने सुरक्षा सेवा या एसडी नाम के दस्ते के जरिए गुप्त रूप से अपने राजनीतिक शत्रुओं के पराभव की योजना बनाई थी। 1931 में स्थापित "एसडी" का मुखिया हिटलर का निकट सहयोगी रेनहार्ड हेड्रिक था। थोड़ा और गहराई में उतरें तो हम पाते हैं कि हिटलर ने होलोकास्ट से पूर्व आज की मशहूर IT कंपनी IBM और Accenture की सहायता से यहूदियों की रेसियल प्रोफाइलिंग की थी।
क्यों बिगड़ी लय -ताल?
बहरहाल, सभी विधानसभा क्षेत्रों में टीमें तेजी से अपने काम में मशगूल थी कि इसी बीच जुलाई 2022 में आयकर छापों के बाद उनकी लय-ताल बिगड़ने लगी। अक्तूबर में ED के छापों के बाद तो क्वाड-A, मुख्यमंत्री सचिवालय और शराब-सिंडिकेट सब एक साथ परेशानी में आ गए। इससे इन टीमों का कमांड-कंट्रोल ध्वस्त होने लगा। शराब घोटाले और महादेव ऐप घोटाले में नाम आने के कारण क्वाड-A के अधिकारी अपनी खाल बचाने में जुट गए।
उधर, इन पंक्तियों के लेखक ने दिसंबर 2022 में अंग्रेजी दैनिक द स्टेट्समैन में खैरागढ़ टेम्पलेट और क्वाड-A पर एक विस्तृत समाचार प्रकाशित किया। उसके बाद मुख्य विपक्षी दल भाजपा के रणनीतिकारों ने ज़मीनी स्तर पर इन दस्तों की पहचान कर उन्हें निष्प्रभावी बना दिया। भारतीय जनता पार्टी के आरोपपत्र में डीजीपी जुनेजा को छोड़कर बाकी सभी अधिकारियों को भूपेश से सांठगांठ का आरोपी तक बताया गया। भाजपा के एक नेता ने चुनाव आयोग को इस सांठगांठ की लिखित शिकायत भी की थी. जिसमें इस पूरे टेम्पलेट का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया गया है।
2023 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर भाजपा ने सरकार बनाई। हालांकि क्वाड-A के कुछ सदस्य अपने अपने तरीकों से वापस सरकारी कृपा के पात्र बन गए। लेकिन ASP अभिषेक माहेश्वरी को घोर नक्सल प्रभावित जगरगुंडा भेज दिया गया। हालांकि ACB-EOW के मुखिया और अभिषेक के पुराने बॉस अमरेश मिश्रा की कृपा से वो ज्यादातर समय रायपुर में ही रहते हैं।
सिर्फ इतना ही नहीं सत्तारूढ़ भाजपा में अपने दो रिश्तेदारों के माध्यम से वो पिछले डेढ़ साल में संगठन और सत्ता के शीर्ष पर बैठे सभी नेताओं की परिक्रमा भी लगा रहे हैं। लेकिन कार्यकर्ताओं के रोष को देखते हुए संगठन मंत्री पवन साय, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा उनको अभयदान देने के मूड में नहीं हैं।
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