अजयभान सिंह
रायपुर। दुनिया के किसी भी कोने में सत्ता का बदलाव एक छोटे मोटे बवंडर से कम नहीं होता। हर निज़ाम की अपनी कुछ विशिष्ट खामियां और खूबियां होती हैं जो परिवर्तन की आंधी थमने के बाद प्रकट होती हैं। छत्तीसगढ़ में दिसंबर 2023 से भारतीय जनता पार्टी की जो सरकार है उसके बारे 2024 के शुरुआती महीनों से ही कयासबाजी सरगर्म है। जितने मुंह उतनी बातें। पार्टी नेता और कार्यकर्ता आमतौर पर निरुत्तर हैं।
हों भी क्यों न? आखिर उनके पास इस बात का क्या जवाब हो सकता है कि ये सरकार चला कौन रहा है? और लाख टके का सवाल कि चल किसकी रही है? कौन है इस सरकार का रासपुतिन? और सैयद बंधुओं की भूमिका में कौन है?
नमस्कार, 'द वक्ता' में आज हम यथामति उस सुलगते और रहस्यमय सवाल की पड़ताल करेंगे कि चल किसकी रही है? ये वो सवाल है जिसने बड़े बड़े लिखाड़ों को भ्रम में डाल रखा है। राजनीति के पंडित अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से अपने-अपने गुंताड़े भिड़ाकर हमको कच्ची पक्की कहानियां परोस रहे हैं। आप इस लेखक को भी उन्हीं में से एक मान लें तो कोई हर्ज न होगा।
बहरहाल, आगे बढ़ने से पहले अगर हम यह तय कर लें कि हम क्या खोजना, सिद्ध करना या बताना चाहते हैं, तो कहानी थोड़ी आसानी हो जाएगी। क्या हम औरंगजेबोत्तर मुगलिया सल्तनत में अपनी मर्जी से बादशाह बनाने और मिटाने वाले सैय्यद अब्दुल्ला खान और सैय्यद हुसैन अली खान जैसे चरित्र इस सरकार में ढूंढ रहे हैं? या मगध सम्राट धनानंद के मुख्य सलाहकार अमात्य राक्षस जैसा? या फिर हमें रूस के अंतिम ज़ार निकोलस द्वितीय को विनाश की कगार पर ले जाने वाले उनके सर्वशक्तिमान सलाहकार ग्रेगरी रासपुतिन की तलाश है?
या फिर हम इटालियन रणनीतिकार मैक्यावली और खंड खंड जर्मनी को एकत्र करने वाले चांसलर बिस्मार्क की चर्चा करना चाहते हैं। आगे बढ़ने से पहले पाठकों को अफसोस के साथ बताता चलूं कि हम आगे जो चर्चा करने वाले हैं उसमें शायद इन सभी के स्याह पक्ष की झलक तो भरपूर देखने को मिलेगी लेकिन उनका उजला पक्ष हम आज के संदर्भ में शायद ही ढूंढ पाएं। लेकिन हम इन सब चरित्रों का एक न एक कोना छूने की कोशिश जरूर करेंगे।
तो सीट बेल्ट बांधकर रखिए, कहानी कुछ लंबी हो सकती है, लेकिन उबाऊ तो शर्तिया नहीं होगी। इस पूरे कथानक की सेटिंग फ्लैशबैक में है, इसलिए वक्त का पहिया पीछे घुमाते हुए हम चलते हैं दिसंबर 2023 जब भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नाउम्मीदी के बावजूद छत्तीसगढ़ में मिली अप्रत्याशित जीत से सकते में था और नए नेता के चयन में उलझा था।
आदिवासी मुख्यमंत्री का मैंडेट लेकर अर्जुन मुंडा और दुष्यंत गौतम रायपुर भेजे गए। किसी और को नहीं तो कम से पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह और वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेवी साय को पता था कि दिल्ली के इरादे क्या हैं। संगठन मंत्री पवन साय और अजय जामवाल भी अनभिज्ञ नहीं थे। विष्णुदेव साय के खेमे ने एक दिन पहले ही जश्न की तैयारी तक कर ली थी।
उधर, राजधानी से सिर्फ 70 किमी दूर राजनांदगांव में बैठे 2005 बैच के एक IPS अधिकारी राहुल भगत अपनी दहलीज पर दस्तक दे रहे 'रासपुतिन मोमेंट' को लेकर रोमांचित थे। पता नहीं उन्हें इस बात का कितना आभास था या शायद अभी कितना बोध है कि उनके 'रासपुतिन मोमेंट' से छत्तीसगढ़ में भाजपा एक व्यापक विनाश के कगार पर पहुंच जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे रासपुतिन के बढ़ते प्रभाव की वजह से जार निकोलस और उनके साथ जारशाही का संपूर्ण विनाश हो गया था। खैर, भाजपा के विनाश की चिंता भाजपा वाले करें, हमें क्या?
जैसा कि तय था, विष्णुदेव मुख्यमंत्री बने। सरकार को नया कलेवर, नया तेवर देने के लिए पुराने अनुभवी नेताओं में से कुछेक लो प्रोफाइल नेताओं को छोड़कर किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। पूरा मंत्रिमंडल नौसिखिए लोगों से भर गया। राहुल दौड़े-दौड़े रायपुर आ गए और अपने अभिन्न सखा आरिफ शेख के साथ पर्दे के पीछे से मुख्यमंत्री के अस्थाई कैंप को स्टेज मैनेज करने लगे।

हालांकि संगठन की तरफ से मुख्यमंत्री के सचिव दयानंद बनाए गए थे, लेकिन मुख्यमंत्री का भरोसा केवल राहुल पर ही था। कुछ ही हफ्तों में दयानंद के रंगढंग संगठन की समझ में आ गए और मजबूरी में सीएम की पसंद राहुल मुख्यमंत्री सचिवालय में लाए गए। संगठन शायद यहीं पर चूक गया क्योंकि राहुल ने सीएम सचिवालय आते ही ऐसी मोहिनी विद्या फैलाई कि संघ, संगठन, मंत्री, विधायक, यहां तक कि साय के परिजन और रिश्तेदार भी एक के बाद एक मुख्यमंत्री से दूर कर दिए गए।
और किसी की तो क्या चले, जिन रमन सिंह ने विष्णुदेव साय को यहां तक पहुंचाया, उनको भी सीएम से बहुत दूर कर दिया गया है। डॉ रमन सिंह की लिखी सिफारिशी चिट्ठियां लीक करके यह विमर्श खड़ा करने की कोशिश की गई कि पर्दे के पीछे से वहीं सरकार चला रहे हैं। यानी चल तो सिर्फ रमन सिंह की रही है। कुछ दिन यह विमर्श खूब चला, आज औंधे मुंह पड़ा धूल फांक रहा है।
लक्ष्य बड़ा था और राह रपटीली और मुश्किल। मुख्यमंत्री साय स्वयं निहायत ही नेक और सज्जन व्यक्ति हैं, इसलिए हर कदम फूंक फूंक कर रखा गया और उन्हें धीरे-धीरे पार्टी के प्रभाव से बाहर निकालकर अपने नियंत्रण में लिया गया। इसके लिये संगठन मंत्री पवन साय, तब के कोषाध्यक्ष नंदन जैन और डॉ विजयशंकर मिश्र को बलि का बकरा बनाने की तैयारी हुई।
पूरे राज्य के सत्ता के गलियारों में माउथ पब्लिसिटी में निपुण भांड छोड़े गए जो दिन रात घूम घूमकर यह बताने लगे कि सरकार तो संगठन के ये तीन लोग चला रहे हैं। ऐसे ऐसे शेखीबाज मैदान में दिखने लगे जो यह दावा करते कि संगठन के फलां के एक फोन पर फलां का इतना बड़ा काम हो गया। इन तीनों के माध्यम से संगठन किस तरह सरकार का दोहन कर रहा है, इसके किस्से तो गली-गली में तैरने लगे।
एक कहावत है बद अच्छा, बदनाम बुरा। सत्ता के शीर्ष पर बैठी बाबूशाहों की चांडाल चौकड़ी ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में रखते हुए भी संगठन को इतना बदनाम कर दिया कि आलाकमान ने संगठन की ही मुश्कें कस दी। आज हालत ये है कि संगठन मंत्री पवन साय को भी सरकार से कुछ कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है, पार्टी में सर्वशक्तिमान होते हुए भी उनकी राय और मशविरों की खुली अवज्ञा मुख्यमंत्री सचिवालय में की जा रही है। ऐसे में बाकी नेताओं की बिसात क्या होगी इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं।
इस बीच, जनता में सरकार का इकबाल लगातार गोता लगाता रहा और संगठन ने सरकार की प्रतिष्ठा बहाल करने के लिए फिर एक जुआ खेल दिया। नीट घोटाले की वजह से परित्यक्त और बहिष्कृत सुबोध कुमार सिंह को मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव बनाकर रायपुर लाया गया। उन्होंने थोड़े दिन कागजी बाजीगरी से सबको बहलाया और फिर निर्बाध सत्ता की चाह में राहुल भगत के साथ मिलकर संघ, संगठन, मंत्रियों और विधायकों को लगे निपटाने। निपटाने तक तो फिर भी ठीक था, हद तो तब हो गई जब वो यह दावा करने लगे कि 'संघ, संगठन माई फुट'।

चलते-चलते अब थोड़ी चर्चा मंत्रियों की भी कर लेते हैं। दोनों उपमुख्यमंत्री अरुण साव और विजय शर्मा सीएम सचिवालय के अधिकारियों के सीधे निशाने पर हैं। उनको उनके ही महकमों में निस्तेज और श्रीहीन कर दिया गया है। यूं निशाने पर तो वित्तमंत्री ओपी चौधरी भी हैं, लेकिन बाबुओं की शतरंज को वो खूब समझते हैं इसलिए बहुत घाटे में नहीं हैं। लेकिन विजय शर्मा की तो हालत बुरी है। राहुल भगत के हाथ में ही गृह विभाग के सारे सूत्र हैं। पिछले साल कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस में उन्हें बुलाया तक नहीं गया। पिछले हफ्ते सम्पन्न हुई उसी कॉन्फ्रेंस में उन्हें अंतिम क्षण में तब बुलाया गया जब ऊपर से यानी दिल्ली से पार्टी के एक शक्तिशाली नेता ने इन अफसरों को फटकार लगाई। जिस सरकार में मंत्रियों के प्रति इतना दुराव हो, वहां सामान्य व्यक्ति या कार्यकर्ता के मान सम्मान की चर्चा तो बेमानी ही है।
इस बार इस कांफ्रेंस के आयोजन की कमान सुबोध के हाथों में थी जो इस सरकार में हर मर्ज की दवा बन जाना चाहते हैं। वो सब कुछ अपने अधिकार क्षेत्र में ले लेना चाहते हैं। सुरसा की तरह सारे अधिकार निगल लेना चाहते हैं। शायद उनके जेहन में अमन सिंह का चमत्कारी प्रभुत्व छाया रहता है। अमन सिंह के मुखालिफीन के शिकवे अपनी जगह हैं लेकिन क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है कि अमन सिंह अपने क्राफ्ट के कुशल कारीगर थे, कुशल शिल्पी थे। क्या सुबोध में वो मेधा, वो प्रखरता और वो ऊर्जा है?
बहरहाल, बात विजय शर्मा की सिस्टेमेटिक जिल्लत और आइसोलेशन की। सीएम सचिवालय के अधिकारियों की शह पर बेमेतरा, बालोद और राजनांदगांव में रेत उत्खनन के अलग-अलग मामलों में कलेक्टरों ने न केवल उनकी खुली अवज्ञा की बल्कि उनके प्रोटोकॉल की भी धज्जियां उड़ा दी। गृहमंत्री के पीएसओ तूफान की गिरफ्तारी को लेकर जो लंबा चौड़ा ड्रामा रायपुर के तब के एसपी ने खेला वह तो किसी गृहमंत्री के अपमान और अवज्ञा का टेस्ट केस है।
खैरागढ़ टेम्पलेट के मास्टरमाइंड अभिषेक माहेश्वरी की पोस्टिंग यूं तो जगरगुंडा में है लेकिन वो ज्यादातर रायपुर में पाए जाते हैं, किसी की मजाल नहीं कि उन्हें टोक सके। किसकी शह पर उन्हें इतनी छूट मिली हुई? संकेत में समझ लीजिए कि बालोद में माहेश्वरी आरिफ शेख के अधीन काम कर चुके हैं। और आरिफ इस सरकार में क्या हैसियत रखते हैं, मुझे पढ़ने वाले यह बखूबी जानते हैं।
बहरहाल, समाचार कथा के इस मुकाम तक आते आते मुमकिन है कि आप ऊब गए हों। इसलिए विराम से पहले झटपट एक दो मुद्दे और बताते चलें। सीएम सचिवालय में हमने राहुल और सुबोध की जोड़ी की फेविकोल के जोड़ जैसी जकड़न पर चर्चा की। लेकिन सीएम सचिवालय के एक नवागत और अति महत्वाकांक्षी अधिकारी डॉ रवि मित्तल के ज़िक्र के बिना यह चर्चा उतनी ही अधूरी और बेस्वाद होगी जैसे बिना नमक का भोजन। मित्तल सीएम सचिवालय में अपनी किस योग्यता की वजह से पहुंचे हैं, यह तो सरकार ही जाने।
लेकिन जिस जनसंपर्क विभाग के लिए वो रायपुर लाए गए थे, उसकी इज़्ज़त तो कब की तार तार हो चुकी है। संगठन की किसी चिंता से मित्तल को कोई लेना देना नहीं, क्योंकि हाउस में बैठे सर्वोच्च अधिकारी पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि संघ-संगठन उनके जूते की नोंक पर। छह महीने में विभाग के बजट का बंटाधार हो चुका है। तिस पर भी फिजूलखर्ची की मीनारें रोज-ब-रोज खड़ी हो रही हैं। राज्योत्सव नजदीक है, लेकिन पत्रकारिता पुरस्कारों को लेकर भाजपा और संघ के मीडिया विभागों से कोई सलाह मशविरा तक नहीं किया गया।
किसी और की छोड़िए, सीएम के मीडिया सलाहकार पंकज झा और भाजपा के मीडिया प्रभारी हेमंत पाणिग्रही को तक ये पता नहीं कि चयन समिति में किसको लिया गया है। पुरस्कार किसको दिया जाना है इसकी चर्चा तो दूर की बात है। सबकुछ रवि मित्तल और उनके चहेते कांग्रेसी समर्थक पत्रकार और अफसर ही तय कर रहे हैं।
अंत में जाते जाते, मेरे खबरी भाजपा और संघ वालों के लिए एक बुरी खबर लाए हैं। खबर है कि रवि मित्तल और उनके कांग्रेस समर्थक पत्रकारों और अफसरों ने IBC न्यूज चैनल की एक महिला पत्रकार को चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता पुरस्कार देने का लगभग निश्चय कर लिया है। भाजपा वालों के लिए इससे भी बुरी खबर ये है कि उक्त महिला पत्रकार न केवल खुद धुर कांग्रेस समर्थक है बल्कि उसके एक नजदीकी रिश्तेदार बिलासपुर के बड़े कांग्रेस नेता हैं और एक अन्य संबंधी कांग्रेस शासनकाल में संवैधानिक पद पर बिठाई गई थी।
पुनश्च, इन कुछ प्रसंगों से अगर ज्यादा नहीं तो इतना तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि सरकार में चल किसकी रही है और उसका परिणाम क्या होगा। अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'अ पाउडर कैग वेटिंग टू इग्नाइट' जिसका अर्थ आमतौर पर अव्यवस्था की वजह से अंदर ही अंदर खदबदाते आक्रोश से लिया जाता है। भाजपा और संघ के केडर में ऐसा ही आक्रोश खदबदा रहा है। लेकिन कहते हैं न सत्ता अहंकार के साथ अंधापन भी देती है। सत्ता में बैठा व्यक्ति अगर बारूद के हिमालय पर भी बैठा हो तब भी उसे चहुं ओर मंगल ही मंगल दिखाई देता है।
अगले कुछ अंकों में ' सुशासन के दुशासन ' नाम से एक पूरी समाचार सीरीज लिखने की योजना है। इस श्रृंखला में हम बिल्कुल ब्लैक एंड व्हाइट में हर उस शख्स, और हर उस करतूत की चर्चा करेंगे जिन्होंने इस सरकार का चीरहरण किया, जनादेश का अपहरण किया। सुधि पाठकों के अपने अनुभवों, दस्तावेजों और सूचनाओं का स्वागत रहेगा। आप 9993960222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।
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