अजयभान सिंह
रायपुर, 4 अक्टूबर। यही कोई साल 2003 की बात होगी, जब हिंदी के ख्यात कवि त्रिलोचन शास्त्री सागर विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक हुआ करते थे। काफी वृद्ध हो चले थे और बीमार थे। दिल्ली के एक नामी पत्रकार किसी कवरेज के सिलसिले में सागर गए और त्रिलोचन की खोज खबर लेने पहुंच गए विश्वविद्यालय के कुलपति के पास। पूछा त्रिलोचन शास्त्री जी कैसे हैं? जवाब मिला कौन त्रिलोचन? कैसा त्रिलोचन?
क्या आपको नहीं लगता कि कुछ-कुछ ऐसा ही सलूक आजकल संघ और भाजपा के बड़े-छोटे नेताओं के साथ छत्तीसगढ़ की सत्ता को अपने हिसाब से हांक रहे बाबू कर रहे हैं। अगर हम आज के परिप्रेक्ष्य में कहें कि कौन ननकी ? कैसा ननकी? तो बहुत असभ्य और अटपटा होते हुए भी अटपटा नहीं लगेगा। क्योंकि, कहने को उनकी पार्टी की सरकार है लेकिन बुजुर्ग ननकी इतने हाशिए पर हैं कि एक अदना कलेक्टर भी उन्हें धमकाता है कि अपने साथ आदमी लेकर क्यों आते हो?
नमस्कार, आज समाचार कथा के केंद्र में हैं ननकीराम कँवर। सूबे के सबसे शक्तिशाली यानि गृह विभाग के मंत्री रह चुके हैं। अपने कैडर और वैचारिक सहयोगियों के सुख-दुःख के लिए लगातार ज़द्दोज़हद की ज़िद के लिए जाने जाते हैं। लेकिन सत्ता के नाभि केंद्र में बैठे बाबू उन्हें बार-बार याद दिला रहे हैं कि उनके दिन अब लद गए। कल शाम को अपने गृह ज़िले कोरबा से मुख्यमंत्री आवास के सामने धरना देने के लिए राजधानी रायपुर पहुंचे और सुबह उनकी ही सरकार के नकचढ़े, बेलगाम, ढीठ और परम भ्रष्ट बाबुओं ने टाटीबंध में जहाँ वह रात्रि विश्राम के लिए ठहरे थे वहीँ नज़रबंद कर दिया।
चारों तरफ हंगामा, लेकिन सत्ता के नाभि केंद्र में कुटिल मुस्कान, शांति और मूंछों पर ताव देते आत्मविश्वास से लबरेज़ अफसर। यह बात दीगर है कि जिन हुक्मरान के खिलाफ ननकी को इस उम्र में ऐसा कठोर कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा, उनमें से ज्यादातर मुछमुँड़े हैं लेकिन उनके अहंकार की मूंछें रावण से बड़ी हैं।
इस समाचार कथा में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि यह नौबत क्यों आयी कि आदिवासी समाज के एक दिग्गज को अपनी ही सरकार के खिलाफ इस हद तक जाना पड़ा। शुरुआत करते हैं ननकी के आरोपों से। ननकीराम ने अपने नोटिस में लिखा कि कोरबा कलेक्टर अजीत वसंत एक हिटलर प्रशासक हैं और उन्हें वहां से हटाया जाना चाहिए। उनका कहना है की कलेक्टर अजित वसंत भ्रष्टाचार के अलावा अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग कर जनता की आवाज को दबाने का प्रयास कर रहे हैं और भाजपा कार्यकर्ताओं का चुन-चुन कर उत्पीड़न कर रहे हैं।
इसके आगे ननकी लिखते हैं कि वसंत को मुख्यमंत्री निवास के एक सचिव का संरक्षण मिल रहा है। उनके इसी आरोप में पार्टी, संघ और वरिष्ठ नेताओं की दुर्गति के सारे सूत्र निहित हैं। लाज़िमी है कि आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि मुख्यमंत्री कार्यालय का वह कौन सा सचिव है जिसके संरक्षण में एक कलेक्टर भाजपा के इतने बड़े आदिवासी दिग्गज के साथ ऐसा घटिया सलूक कर रहा है।
सीधे किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय हम मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात अधिकारियों के कामकाज और चालचलन पर सरसरी नज़र दौड़ाते हैं, मुमकिन है कि हमें कोई वाज़िब जवाब मिल जाये। मुख्यमंत्री कार्यालय में इस समय सुबोध कुमार सिंह, राहुल भगत, पी दयानन्द, बासव राजू, मुकेश बंसल और डॉ रवि मित्तल तैनात हैं। सुबोध सबसे वरिष्ठ और प्रमुख सचिव हैं। नीट घोटाले के बाद लांछित जीवन गुजार रहे थे और पुराने अनुभव की वजह से कुछ महीने पहले दिल्ली से रायपुर लाये गए थे।
लेकिन यहां आकर उन्होंने पाया कि सरकार के शीर्ष पर मुख्यमंत्री के अलावा आसपास सारा पॉलिटिकल स्पेस खाली है। मुख्यमंत्री सचिवालय नौसिखिए और नाकारा अफसरों से भरा पड़ा है। तो इस निर्विघ्न सत्ता को भोगने के लिए जी मचलने लगा। सीएम के दुलारे लेकिन घोर महत्वाकांक्षी सचिव राहुल भगत उनके मंसूबों के आड़े आ सकते थे इसलिए राहुल के साथ गलबहियां कर ली। लेकिन अभी भी संघ और संगठन के नेता बाधा बने हुए थे।
उनको उनकी हद बताने के लिए बाकायदा जिला कलेक्टरों और मंत्रालय के सचिवों को ताक़ीद की गई कि संघ-संगठन की बातों को ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत नहीं। क्योंकि संघ और संगठन को वो अपने जूते की नोंक पर रखते हैं और सीधे दिल्ली वालों को रिपोर्ट करते हैं। उनके इस मशविरे का अधिकारियों पर क्या असर हुआ उसके लिए एक छोटे से किस्से पर चलते हैं।
दअरसल, हुआ यूं कि खाद्य विभाग की सचिव शहला निगार सुबोध की सलाह पर कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई और उन्होंने पूरे प्रदेश के मठों, मंदिरों और आश्रमों की हजारों एकड़ भूमि को धान खरीदी की सूची से बाहर कर दिया। आश्रमों के महंतों और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा लिया लेकिन नाम वापस नहीं जुड़े। आखिर में उन्हें ननकी राम की तरह मुख्यमंत्री निवास के सामने धरना देने की धमकी देनी पड़ी तब जाकर उनका मामला सुलझा। यह कहानी बड़ी दिलचस्प है लेकिन इसपर विस्तार से किसी और समाचार कथा में चर्चा करेंगे।
इसके बाद आते हैं 2005 बैच के IPS राहुल भगत। अगर आप उन्हें इस सरकार का वास्तविक नियंता या डिफेक्टो सीएम कहें तो गलत न होगा। उनके इशारे के बिना इस सरकार का पत्ता इधर से उधर नहीं हो सकता। संघ-संगठन अपना कितना भी सिर पटक लें। सरकार में उनका इक़बाल बुलंद बना रहे इसके लिए मंत्रिपरिषद तक को काट-छांट कर बौना कर दिया गया है।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और अरुण साव और वित्तमंत्री ओपी चौधरी को खासतौर से निशाने पर लिया गया है। जनसंपर्क से बाकायदा संपादकों को एडवाइजरी भेजी जाती है कि इन तीन मंत्रियों को ज्यादा स्पेस नहीं दिया जाए। वित्तमंत्री के खिलाफ एक अनावश्यक खबर को तूल देने के लिए तो एक बार इस लेखक से भी संपर्क किया गया।
2005 बैच के आरिफ शेख राहुल के मेंटर, गाइड, फिलॉसफर और अभिन्न मित्र हैं। राहुल के मार्फत आरिफ इस सरकार पर जबरदस्त नियंत्रण रखते हैं। राजनीति में आरिफ के संरक्षक पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हैं। यूं तो आरिफ SSP थे लेकिन पिछली सरकार में उनका रुतबा डिफेक्टो डीजीपी का था।
उस दौर में विपक्षियों और मीडियाकर्मियों के खिलाफ दमन के जितने प्रकरण आए उन सबके मुख्य शिल्पकार आरिफ ही थे। इसलिए राहुल ने पुलिसिंग से लेकर तमाम मसलों को अपने हाथ में ले रखा है और वह गृहमंत्री की एक नहीं चलने देते। वज़ह सिर्फ इतनी कि आरिफ पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए।
अब फिर लौटते हैं ननकी की तरफ। दरअसल ननकीराम मुख्यमंत्री कार्यालय के जिस शक्तिशाली सचिव पर कलेक्टर अजीत वसंत को बचाने का आरोप लगा रहे हैं, वह संभवतः राहुल भगत ही हैं। क्योंकि राहुल के अलावा किसी और अफसर के लिए सरकार ननकी राम जैसे जुझारू नेता से टकराव मोल नहीं ले सकती।
इसके बाद आते हैं पी दयानंद यानी दयानंद पांडेय। संघ भाजपा में अपने एक निकट संबंधी की कृपा से मुख्यमंत्री कार्यालय में सबसे पहले अपनी जगह बनाने वाले दयानंद की हरकतों और कारनामों की वजह से शुरुआत से ही सरकार की किरकिरी होने लगी थी। 'प्रथम ग्रासे मच्छिका पात" की तर्ज पर इस सरकार का आगाज़ ही दयानंद की वजह से बहुत घटिया और लचर रहा।
आबकारी विभाग में इन्होंने शुरू में लूट और कुशासन का ऐसा तांडव मचाया कि एक महिला अधिकारी का जीना दूभर हो गया। फिलहाल उन्हें धीरे धीरे किनारे लगाया जा रहा है लेकिन उनकी अक्षमता की वजह से नहीं बल्कि सीएम सचिवालय के अधिकारियों के आपसी डायनामिक्स की वजह से।
मुकेश बंसल और बासव राजू फिलहाल बहुत लाइमलाइट में नहीं हैं और विवादों से बचकर रहते हैं। लेकिन हाल ही में सीएम हाउस में दाखिल हुए डॉ रवि मित्तल विवादों के परनाना हैं। उनकी निजी ज़िंदगी के झमेलों और पेचीदगियों से इतर उनकी प्रोफेशनल लाइफ विवादों और नाकामियों का जीवंत स्टेटमेंट है। डीपीआर महकमे के आयुक्त के रूप में उन्हें अपनी नाकामी, कांग्रेस-परस्ती और हेकड़ी के लिए याद किया जाएगा।
लेकिन पता नहीं उनमें ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैं कि उनकी नाकामियों की फेहरिस्त जितनी लंबी हो रही है उतना ही रुतबा उनका इस सरकार में बढ़ता जा रहा है। भाजपा नेतृत्व जब-जब इनपर इस बात का दबाव बढ़ाता है कि वह भाजपा के करीबी समझे जाने वाले पत्रकारों का भी कुछ ख्याल रखें तो इनका कहना होता है कि उन्हें इस झगड़े में नहीं पड़ना वरना अगली बार कांग्रेस सरकार आएगी तो बेवजह ही उनका करियर खराब हो जाएगा।
सीएम सचिवालय और सरकार की दशा दिशा के इस संक्षिप्त अवलोकन से हम ज्यादा नहीं तो एक निष्कर्ष पर तो पहुंच ही सकते हैं कि 'कुछ तो गड़बड़ है दया'। सरकार भाजपा की नहीं भाजपा की विरोधी है। ननकीराम सीधे और सरल हैं, बेचारे समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार उनकी नहीं 2005 बैच के अफसरों की है।
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