उन्हें सीएस नहीं, अर्दली चाहिए, और अमिताभ से अच्छा कौन होगा

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उन्हें सीएस नहीं, अर्दली चाहिए, और अमिताभ से अच्छा कौन होगा

रायपुर, 27 अगस्त।

अजयभान सिंह

भूपेश राज में जिन अफसरों के कारण न्याय, कानून और राजकाज की मर्यादाएं जमीन में गाड़ दी गईं, निज़ाम बदलने के बाद वो सारे के सारे हुक्काम शहद-मलाई में गले तक तर हैं। एक्सटेंशन की वैसाखी के सहारे उड़ रहे मुख्य सचिव ऐसे कारकूनों में अव्वल हैं। आज पड़ताल करते हैं कि क्यों कांग्रेसी तख्तोताज की रुखसती की बावजूद दरबारी आज भी मजे से वहीं जमे हुए हैं। और सिर्फ जमे हुए नहीं हैं निज़ाम बदलने में अपना खून पसीना बहाने वालों को चिढ़ा भी रहे हैं।

बहरहाल, पहले चर्चा मुख्य सचिव की। 30 जून को रिटायरमेंट यानी चला-चली की बेला में अकस्मात उनके सेवा विस्तार के आदेश से प्रदेश के सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। एक ऐसे व्यक्ति को, जिसकी नाक के नीचे भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में राशन, कोयला, शराब और डीएमएफ में बड़े बड़े घोटाले हुए, आवाज उठाने वालों का दमन किया गया। दर्जनों लोगों को जेल जाना पड़ा। ईडी और आयकर विभाग संलिप्त लोगों के खिलाफ सीएस अमिताभ जैन को चिट्ठियों पर चिट्ठियां लिखता रहा लेकिन उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

 

खैर, नवंबर 2023 में उस निरंकुश और भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ स्पष्ट जनादेश आया और उम्मीद की जाने लगी कि इस बार निर्णायक प्रशासनिक सर्जरी की जाएगी और दोषी अफसरों को उनके किए का अंजाम भुगतना होगा। लेकिन यह एक ऐसा दिवा-स्वप्न साबित हुआ जो इस सरकार में अब कभी पूरा नहीं हो सकता। उल्टे पिछली सरकार के सारे दमन और लूट खसोट को कवर फायर देने वाले डीजीपी अशोक जुनेजा को विस्तार पर विस्तार दिए गए।

उस दौरान भयानक अत्याचार और लूट को धृतराष्ट्र के समान चुपचाप ढील देते रहे सरकारी मशीनरी के सर्वोच्च अधिकारी यानी मुख्य सचिव अमिताभ जैन न केवल अपने पद पर बने रहे, बल्कि एक एक्सटेंशन भी पा गए। सवाल उठता है आखिर क्यों?

इस समाचार-कथा में हम सारे कारणों की पड़ताल तो नहीं कर सकते लेकिन कुछ खास बिंदुओं को समझने की कोशिश करते हैं। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की नाक के बाल , आंखों के तारे, दिल के दुलारे और जिगर के टुकड़े उनके सचिव राहुल भगत। 2005 बैच के IPS राहुल भगत पिछली सरकार में बड़े आराम से राजनांदगांव में DIG बने बैठे थे और भाजपा को सदा के लिए सत्ता से दूर रखने के लिए क्वाड-A के खैरागढ़ टेम्पलेट को चुपचाप देख रहे थे। कहा तो यहाँ तक जाता है कि उनके अभिन्न मित्र आरिफ शेख ने तत्कालीन निज़ाम में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके राजनांदगाँव में DIG की पोजीशन क्रिएट करवाई थी. 

मुख्यमंत्री का भरोसेमंद होने के कारण सत्ता की सारी चाभियां और सूत्र प्रकारांतर से राहुल के हाथ में ही हैं। और राहुल इस सरकार में ऐसे किसी भी व्यक्ति को बर्दाश्त करने को राजी नहीं हैं जो उनकी एकछत्र, निर्बाध, अनियंत्रित सत्ता के लिए ज़रा भी खतरा हो सकता है। मुख्य सचिव के रूप में अमिताभ की भूमिका अभी तक मूक-दर्शक या धत कर्मों के मौन समर्थक की रही है।

 चूँकि, राहुल के लिए अमिताभ अब तक एकदम मुफीद साबित हुए हैं। इसलिए वो सरकार बदलने के बाद भी अपनी जगह पर जमे रहे। उनके रिटायरमेंट के बाद वरीयता क्रम में रेणु पिल्लै का नंबर आता है। रेणु तो सख्त मिज़ाज और ईमानदार अधिकारी ठहरीं, तो ज़ाहिर है उनके साथ सुशासन का मेल नहीं खा सकता इसलिए उनके नाम पर विचार तक नहीं किया जा रहा है. 

दूसरे क्रम में सुब्रत साहू हैं। दूध के धुले तो सुब्रत भी नहीं है। लेकिन इतना तय है कि वो सुबोध सिंह और राहुल के अर्दली या रबर स्टैम्प भी नहीं बन सकते। सिंडिकेट सुब्रत को रोकने के लिए कितने प्रयास कर रहा है इसकी एक बानगी ये है कि अमिताभ अभी विदेश यात्रा पर हैं और रेणु के छुट्टी में होने की वजह से सुब्रत को चार्ज न देना पड़े इसलिए बिना किसी को चार्ज दिए ही यात्रा पर निकल गए।सुब्रत को यह सिंडिकेट फूटी आंखों नहीं देखना चाहता।

इसके बाद आते हैं मनोज पिंगुआ और ऋचा शर्मा। शर्मीले पिंगुआ राहुल सुबोध की पहली पसंद हैं। क्योंकि वो राहुल की मर्जी के बगैर अपने स्थान से हिलते डुलते तक नहीं हैं। ऋचा शर्मा सुबोध सिंह की करीबी हैं और आखिरी विकल्प के रूप में उनका नाम रखा गया है। हालांकि वो भी काफी खुर्राट मानी जाती हैं ऐसे में लगता नहीं कि सिंडिकेट उनको सीएस बनने देगा।

अब आते हैं किस्सा-ए-एक्सटेंशन पर। दरअसल, हुआ यूँ कि पिंगुआ के नाम पर केंद्र सरकार राजी नहीं हुई तो सुब्रत को रोकने के लिए आनन-फानन में मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप का आग्रह किया गया और उन्होंने कार्मिक मामलों के राज्यमंत्री डॉ जीतेन्द्र सिंह से अमिताभ को कुछ दिन का सेवा विस्तार देने का आग्रह किया।   

चलते चलते अब आपको थोड़ा क्वाड-A के बारे में भी बता दें. पुलिस महकमें में क्वाड-A उस समय के डीजीपी अशोक जुनेजा, इंटेलिजेंस के मुखिया आनंद छाबड़ा, एसएसपी आरिफ शेख और एएसपी अभिषेक माहेश्वरी के समूह को कहा जाता है। आजकल इसमें जुनेजा की जगह अमरेश मिश्रा ने ले ली है। पुलिस महकमें में इनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता था। आज भी कमोबेश वही स्थिति है। आरिफ शेख इस पूरे समूह के थिंक-टैंक हैं और मुख्यमंत्री के दुलारे अधिकारी राहुल भगत, सिर्फ आरिफ के बैचमेट ही नहीं बल्कि उनके लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर देने वाले अभिन्न सखा हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो आरिफ का कहा इस सरकार में पत्थर की लकीर है यानी उनका वचन ही है शासन। और  यह समझने के लिए किसी राकेट साइंस की जरुरत नहीं है कि चाहे कुछ भी हो लेकिन आरिफ कम से कम भाजपा और संघ के मित्र या हितैषी तो हो नहीं सकते। इससे पाठक स्वयं समझ पा रहे होंगे कि पिछली सरकार का थिंक टैंक इस सरकार की चाबी भी अपने पॉकेट में रखता है। यह तथ्य संघ और संगठन को समझना चाहिए कि कैसे मुख्यमंत्री के एक चहेते अधिकारी के कारण पूरी सत्ता 2005 बैच के आईपीएस अधिकारियों के चरणों की दासी बनी हुई है। 

पाठक यह भी खूब ही जानते हैं कि प्रदेश के मुखिया सरल और सौम्य स्वभाव के हैं। सहज विश्वासी हैं इसलिए सियासी तिकड़में और प्रशासनिक चालबाजी को वे ज्यादा नहीं समझते हैं। इसी का फायदा उठाकर चालाक अधिकारी उनको धीरे-धीरे संघ और संगठन से दूर करते जा रहे हैं। पहले इन अधिकारियों ने जीपी सिंह को रोकने के लिए सारे पैंतरे आजमाए जबकि संघ भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उनको बाइज़्ज़त बहाली का हामी रहा है।

फिर पवनदेव या हिमांशु गुप्ता को डीजीपी बनाने के लिए काफी तिकड़में की। लेकिन संघ के समर्थन के कारण अरुण देव गौतम किसी तरह डीजीपी बने हुए हैं। लेकिन जिनको रबर स्टैम्प डीजीपी की लत लग गई है वो उन्हें कितने दिनों तक टिकने देंगे यह पता नहीं। 

इस कहानी में भाजपा को हमेशा के लिए सत्ता से बाहर रखने के लिए जिस खैरागढ़ टेम्पलेट यानी मॉडल की चर्चा की गयी है उस पर विस्तार से किसी और समाचार में चर्चा करेंगे। 

 
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