2023 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक अप्रत्याशित करवट ला दी। सत्ता परिवर्तन के साथ ही न सिर्फ राजनीतिक रंग बदला, बल्कि उन चेहरों की भी असलियत सामने आने लगी, जिन्होंने वैचारिक मुखौटों के पीछे वर्षों से सत्ता की मलाई चखी थी।
गेरुए रंग की वापसी के साथ जिन लोगों ने वर्षों तक 'तिरंगे' के नाम पर सत्ता का लाभ उठाया, वे अचानक पुराने गेरुए लबादों को झाड़-पोंछकर फिर से चमकाने में जुट गए। इस लेख में हम पड़ताल करेंगे उस सत्ता-लोलुप तंत्र की, जिसकी चाटुकारिता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
🔸 सत्ता परिवर्तन और चाटुकारों की सक्रियता
भाजपा की सत्ता में वापसी होते ही छत्तीसगढ़ के मीडिया, नौकरशाही और रसूखदार वर्गों में हलचल शुरू हो गई।
पाँच साल पहले जिन अफसरों और पत्रकारों ने भाजपा नेताओं को दरकिनार कर रखा था, वही आज उनके दरवाज़ों पर दस्तक दे रहे हैं।
जो कल तक भाजपा के खिलाफ 'कोई चांस नहीं' की भविष्यवाणियाँ कर रहे थे, वे आज कांग्रेस के पराजय गीत गाते नहीं थकते।
🔸 वैचारिक प्रतिबद्धता या अवसरवाद?
जो चेहरे कल तक 'सेकुलरिज़्म' के झंडाबरदार थे, आज अपनी वैचारिक स्थिरता का ढोल पीटते हुए गेरुआ खेमे में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं।
कोई अपने "भैया" के कंधे पर चढ़कर सत्ता के समीकरण साध रहा है, तो कोई "वैचारिक निष्ठा" की आड़ में घुसपैठ करना चाह रहा है।
कांग्रेस पार्टी, जो हाल ही में सत्ता से बाहर हुई है, संभवतः यह सोचकर हतप्रभ होगी कि कम से कम 'शोक काल' में तो इनका यह विचलन थम सकता था। लेकिन सत्ता के भूखे इन चेहरों के लिए संवेदनशीलता बेमानी है।
🔸 नौकरशाही का वैचारिक व्यापारीकरण
कुछ वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने पिछली सरकार में अपनी हैसियत से बढ़कर ताकत पाई, माफियाओं को संरक्षण दिया, और पुलिसिया तंत्र को दमन का औजार बनाया—वे अब "2005 बैच" के बंधुत्व के सहारे नई सत्ता में प्रवेश की फिराक में हैं।
ईडी की रडार पर रहे अफसर भी अब सत्ता का हिस्सा बनने को लालायित हैं, और शर्मनाक रूप से नए निज़ाम के मुस्तफा बनने का सपना पाल रहे हैं।
🔸 मीडिया की गिरती साख
छत्तीसगढ़ की मीडिया का एक बड़ा तबका सत्ता परिवर्तन के साथ अपने रंग बदलने में माहिर रहा है।
कल तक जो पत्रकार सरकार की मामूली आलोचना पर प्रेस की स्वतंत्रता का नारा बुलंद करते थे, आज भाजपा नेताओं को सिर-आँखों पर बैठा रहे हैं।
यह वैचारिक दोमुंहापन न सिर्फ लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता को भी संकट में डालता है।
🔸 सत्ता और चाटुरि माया
यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी भूखे-प्यासे समूह के बीच अचानक सत्ता की रोटियाँ फेंक दी गई हों। इन पर गिरने-कूदने वालों की चाटुरि माया इतनी तीव्र है कि भाजपा का नेतृत्व भी इनसे मोहित हो सकता है। लेकिन सावधान! यदि भाजपा ने इन सत्ता-भक्षकों को पहचानने में गलती की, तो यही लोग जल्द ही जनादेश की चाबी हथिया सकते हैं।
🔸 वैचारिक निष्ठा बनाम सत्ता का प्रलोभन
किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारों, शिक्षाविदों और विचारकों की वैचारिक निष्ठा स्वीकार्य और जरूरी होती है। पर यह निष्ठा सत्ता परिवर्तन से प्रभावित हो जाए, तो वह अवसरवाद बन जाती है। छत्तीसगढ़ के बहुत से पत्रकार और नौकरशाह आज इसी दोराहे पर खड़े हैं—जहाँ आचरण, नीयत और निष्ठा सब कुछ सत्ता के आधार पर तय हो रहा है।
🧾 निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में सत्ता बदल चुकी है, पर सत्ता के आसपास मंडराने वालों की फितरत नहीं। यह 'चाटुरि माया' इतनी घातक है कि यदि भाजपा नेतृत्व ने समय रहते इसका संज्ञान नहीं लिया, तो वही ताकतें जो कल कांग्रेस के चरणों में थीं, कल को भाजपा के तख्त को भी डगमगाने में संकोच नहीं करेंगी।
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